क्या कव्वा कभी प्यासा था?
क्या आशा का एक अर्थ निराशा था?
जब भी मुड़ के देखता हूँ तो माँ दिखाई देती है,
और आगे देखता हूँ तो तमा दिखाई देती है !
क्या सपने वो थे जो रात को देख कर सुबह भूल जाया करता था,
या जो दिन में देखे थे और भुला के भी नहीं भूल पाया !
सपनों की तीव्र धारा में बहता चला गया,
सोचा था तैरना सीखूंगा पर डूबना भी नहीं सिख पाया,
सोचा था किनारे की दलदल ही बेहतर होगी ,
कहाँ समझ थी ,भंवर की दशा तो और भी बदतर हो गयी !
घड़ी के साथ ,
भंवर की गति धीरे हो गयी
और पानी की जंजीरें हो गयी ,
ज़िन्दगी भर ये कहता चला गया
जीना नहीं सीखा पर जीना सीख गया
कहाँ जीना सीखा मैं तो पीना सीख गया !